Saturday, June 21, 2025

मसूरी याद एक धुंध भरे दिन की

यूं धुंध छाई है इन पहाड़ों पे
क्यूं धूप सिक रही हो बर्फ के अंगारों पे ।

आसमान से चोटी पर और
फिर चोटी से वादी में
धुंध तिर रही ऐसे जैसे 
रूई के फाहे घाटी में ।।

पकड़ा पकड़ी खेल रहे हैं 
बादल के छोटे बच्चे
तरह तरह के रूप बनाकर 
हंसते हैं बूढ़े बादल ।

एक दूसरे से लिपटे
हैं प्यार पगे अल्हड़ बादल
देख देख उनको हंसते हैं
विगत यौवन अधेड़ बादल ।

तितलियां भी बौरायी सी
होड़ मचाए गगन चूमने की 
कभी ऊर्ध्वधर कभी क्षैतिज
मंडराती है चहुदिश में ।

दो प्यारी सी देशी गाएं 
मगन है चारा चरने में 
चिड़ियाएं भी उदक फुदकती
इस डाली से उस डाली ।

आसमान छूने को  चिड़ियों की 
होड़ मची सी रहती है 
नन्हे पर थक जाए भले पर
हौसला न उनका थकता है ।

यहां वहां से इधर उधर से
चिड़िया चुगती कीड़े दाना 
चिड़ियों के मीठे सुर से 
सारा मौसम हो उठता दीवाना ।


चोटी पर पहाड़ की सुंदर 
है राधा कृष्ण मंदिर 
इस पावन मंदिर में आ
आत्मा हो उठती है आह्लादित ।


कभी चोटियों से वादियों में उतरती 
कभी हवाओं के संग तिरती,
जून में धुंध घिरी मसूरी
कितनी प्यारी लगती है ।

30.6.24